इश्क़ की पहली बारिश का इज़हार

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शाम के 5 बजे थे और कॉलेज के लगभग स्टूडेंट्स घर को निकल चुके थे जो बच गए थे उन्हें या तो जल्दी नहीं थी घर जाने की या फिर उनका घर कॉलेज के नजदीक ही था।

शाम विदा ले रही थी, पर बारिश का अभी दिल्ली को भिगाने का काम पूरा नहीं हुआ था। दोपहर के बाद से ही जो बारिश शुरू हुयी तो अभी तक नहीं रुकी।

शाम के साथ ही दिल्ली की बारिस और सड़को का पानी भी बढ़ रहा है।

सही कहते है लोग दिल्ली की बारिश भी यहां रहने वाले लोगों की तरह ही है, बे-समय और बेवफा। हमेशा जब जरूरत नहीं होती तभी आ जाती है” सिद्धार्थ जैसे खुद से ही बात करता हु बोल पड़ा।

बाहर बारिश और अंदर सिद्धार्थ का खुद से बात करना, दोनों जैसे साथ ही शुरू हुआ था। लाइब्रेरी में घूम घूम कर और सारी खिड़कियों से झांक झांक कर वो बस दिल्ली और यहां की बारिश को ही कोस रहा था। अपनी कुर्सी से उठता खिड़की से बाहर देखता, और बारिश को जी भर कोस लेने के बाद फिर से अपनी कुर्सी पर आके बैठ जाता । गुलाबी सर्दियों की पहली बरसात। किसे नहीं पसंद ये कोहरे वाली सर्दिओं को और सिहरा देने वाली बरसात। पर सिद्धार्थ था की बरसात के साथ ही मेढंक की तरह उछल कूद में लग गया था।

शाम थी तो इसलिए ज्यादा तक लाइब्रेरी खाली ही थी, इक्का-दुक्का स्टूडेंट जो थे भी वो या तो बातों में या फिर किताबो में मशगूल थे। बस एक सिद्धार्थ ही था जिसका इस बारिश ने कुछ चुरा लिया था जैसे।

वो फिर से अपनी कुर्सी से उठा ही था की इशिता बोली “बैठ जाओ न तुम्हारे ऐसे परेशां होने से तो बारिश नहीं रुक जायगी न ”

सिद्धार्थ कुछ नहीं बोला और अपनी जगह चुप चाप बैठ गया ।

इशिता हलके से मुस्कुरा दी।

क्या हुआ अब तुम क्यों मुस्कुरा रही हो?”

कुछ नहीं बस ऐसे ही ”

अच्छा सुनो, अच्छी लग रही हो तुम आज”

“ओह थैंक्यू, बारिश का कुछ तो फायदा हुआ” इशिता फिर से मुस्कुरा दी ।
कोई और दिन होता तो इशिता जरूर पलट कर पूछती “क्यों रोज नहीं लगती क्या?”
फिर सिद्धार्थ कहता “ख़राब मत किया करो न, इतने प्यार से तारीफ करता हु फिर तुम” और अपना शांत सा चेहरा इशिता के आगे कर देता।
इशिता मुस्कुराती और फिर सिद्धार्थ कहता “हाँ बस, ये स्माइल काफी है तारीफ के जवाब में”

पर बारिश ने बहुत कुछ बदल दिया था इनके बीच। अभी दिन ही कितने हुए है इन्हे दोस्त से हमसफ़र बने। फर्स्ट ईयर का बैच अभी भी फर्स्ट ईयर में ही तो था और उस पर भी अभी आयी ये सर्दियाँ इनके बीच कितनी ही करीबियां लाती। फिर भी दोनों अपने अपने हिस्से का प्यार समेटे रिश्ते को अभी ढालने में लगे थे। दोनों जैसे किसी मजबूत कारीगर की तरह बस उतना ही प्यार बिखेरते जितना दोनों को समेट लेना आसान होता । यूँ भी रिश्ते को ज्यादा खुला छोड़ दो तो दूरियां करीब आने लगती है ।

आमने सामने बैठे इशिता और सिद्धार्थ किताबों के जरिये ही मिले थे इसलिए किताबो में मिलना ही इन्हे ज्यादा पसंद था। सिद्धार्थ इशिता की लाल ऊनी शृग (लम्बा कोट) को देखता फिर इशिता के आँखों में अपने हिस्से का प्यार खोज किताबों में खो जाता।
इशिता ने अपनी किताब बंद की और खिड़की से बाहर देकते हुए अपनी हमेशा वाली मुस्कान में एक अनकही मुस्कान और शामिल कर हस दी।


अब तुम कहा जा रही हो ?” सिद्धार्थ बोला

बुक चेंज करने जा रही हूँ”

Okay I am coming too”

सेकंड फ्लोर की सीढियाँ चढ़ते हुए सिद्धार्थ ने एक बार खिड़की से बाहर देखा पर इस बार वो गुर्राने की बजाय शांत दिखाई दिया। जैसे उसने इन गुलाबी सर्दियों से समझौता कर लिया हो।

इकोनॉमिक्स सेक्शन जो की हिस्ट्री सेक्शन के ठीक पीछे था, पहुंच कर इशिता ने अपनी पुरानी किताब शेल्फ में रखी और दूसरी किताबों को पलटने लगी।

अच्छा सुनो तुम कभी उर्दू सेक्शन की तरफ गयी हो” सिद्धार्थ बोला

इशिता थोड़ा मुस्कुरायी फिर बोली “नहीं”

सिद्धार्थ कुछ बोलता इससे पहले ही इशिता बोल पड़ी वैसे उर्दू सेक्शन की तरफ जाने की क्या जरूरत है आज तो लाइब्रेरी वैसे भी खाली है।
ख़ामोशी के बीच बारिश के खिड़की के शीशे पर पड़ने की आवाज और दोनों की आँखों का आपस में टकराना।

सिद्धार्थ, इशिता के होठ आपस में टकराये और जैसे बारिश की कुछ बूंदे वही खिड़की के बाहर ठहर गयी या नजारा देखने को। दोनों का दिल एक बार जोरों से धड़का और फिर जैसे होठो के साथ किसी प्यास को ढूंढ़ने निकल गया

शब्दों की जुर्रत नहीं रह गयी और होठ आपस में अपनी प्यास साझा कर गए ।
दिल्ली की सड़कों के साथ दोनों के अधरों की तकलीफ भी एक दूसरे के साथ साझा होकर ख़तम हो रही थी ।

बारिश ने बरसना जारी रखा, शाम ठहर सी गयी। हवाओं ने कुछ देर खिड़की के पास रुक कर जलन भरी नज़रों से उन्हें देखा और फिर गुर्रा कर आगे बढ़ गयी ।
इश्क़ की पहली बारिश और बिना शब्दों का पहला इज़हार, लोधी गार्डन और दयाल सिंह कॉलेज से गुजरी हवाओं में आज भी बसता होगा।


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