राहुल गांधी का इस्तीफा? – 6 सबूत जो यह स्थापित करते हैं कि गांधी वंश का अंत हो सकता है

End of Gandhi Era
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2019 का चुनाव कई मायने में बड़ा ख़ास रहा। जहां नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) दोबारा से एक बेहतरीन प्रधानमंत्री के तौर पर गद्दी संभाली वही गाँधी परिवार अपने ही गढ़ अमेठी में हार गया। भाजपा के 300 सीट की जीत के जवाब में कांग्रेस केवल 50 सीटों पर ही सिमट गयी। जहाँ कुछ लोग इस चुनाव को लोकतंत्र की लड़ाई के तौर पर देख रहे थे वही संघ परिवार इसे कांग्रेस का आखिरी वर्ष और उम्मीद बता रहे है।

देखा जाये तो ये चुनाव भाजपा की जीत और कांग्रेस की हार तक ही सीमित नहीं रहा है, इस चुनाव के बाद कांग्रेस की न केवल कार्य प्रणाली बल्कि ‘क्या कांग्रेस अब कभी भारत में पहले की तरह चमक सकेगी या नहीं’ के सवाल के साथ भी देख रहे है। और अगर कांग्रेस का भारत की राजनीती में दोबारा से आगमन होता है तो उसमे गाँधी परिवार का कोई रोल होगा भी या नहीं ?

हालाँकि राहुल गाँधी वायनाड (Waynad) से चुनाव जीत कर संसद में बैठेंगे पर शायद ही वो अमेठी की हार को भुला पाएंगे। क्या कांग्रेस की ये हार गाँधी परिवार के ख़तम होने की निशानी है? नीचे दिए सबूत शयद इसी और इशारा करते है:-

अमेठी (Amethi) की बड़ी हार

देश की राजनीती का सबसे बड़ा गढ़ है उत्तर प्रदेश, कहा जाता है की जो उत्तर प्रदेश को जीतता है प्रधानमंत्री की कुर्सी उसकी। पर इस बार तो कांग्रेस और गाँधी परिवार का गढ़ कहे जाने वाला अमेठी ही कांग्रेस नहीं बचा पायी।

अमेठी वह जगह है जहां से उनके पिता राजीव गाँधी, माँ सोनिया गाँधी लड़े और जीते। उन्होंने खुद 15 सालों से अमेठी को अपने परिवार की तरह संभाला।

राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) ने इस बार के चुनां में अमेठी के हर परिवार को एक भावुक पात्र भी भेजा जिसमे ‘अमेठी मेरा परिवार’ सम्बोधन था। हर नीति इस्तेमाल करने के बाद भी राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) एक हाई प्रोफाइल अभिनेत्री स्मृति ईरानी (Smriti Irani) से हार गए।

हालाँकि इस बार भी कांग्रेस से प्रधानमंत्री की कुर्सी जीतने की उम्मीद नहीं थी पर फिर भी उनका अमेठी भी हार जाना कुछ और ही संकेत करता है।

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चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन

कांग्रेस का प्रदर्शन न केवल लोकसभा के चुनावों में ख़राब रहा बल्कि रीजनल चुनावों में भी इसका प्रदर्शन ख़राब रहा। कई विश्लेषक पहले से ही कांग्रेस पार्टी व इसके नेतृत्व पर सवाल उठा रहे है। राहुल गाँधी का इस्तीफा उनकी नाकामयाबी को ही उजागर करता है

भले ही उनकी पार्टी उनको इस हार का जिम्मेदार न माने पर फिर भी ये हार गाँधी परिवार की नाकामयाबी तो है ही।

इस्तीफे के सवाल पर मणिशंकर अय्यर ने कहा की कांग्रेस राहुल गाँधी के नेतृत्व पर सवाल नहीं उठती है।

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पार्टी की दुर्दशा

लखनऊ की स्थानीय पार्टी के प्रवक्ता, बिजेंद्र सिंह के अनुसार समस्या गाँधी परिवार के नेतृत्व में नहीं बल्कि पार्टी की दुर्दशा के साथ है। पार्टी के ढांचा सिर्फ कमजोर नहीं जर्जर हो चूका है।

कांग्रेस ने पार्टी और इसके लोगों पर कम और देश की गद्दी पर जयदा ध्यान लगाया शायद यही कारन रहा है की इस बार की हार कांग्रेस के लिए बड़ा सबक बनी है।

इस बार की हार केवल राहुल गाँधी की हार नहीं बल्कि कोंग्रेस पार्टी की हार है।

हालाँकि बात चाहे जो हो, राहुल गाँधी या गाँधी परिवार भारत की राजनीती से धूमिल होते प्रतीत होते है।

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कमजोर अभियान और विकल्प

2014 या 2019 सबसे ख़राब प्रदर्शन कब रहा तय कर पाना मुश्किल है। कांग्रेस के साथ जुड़े हुए पुराने नेता भी अब अपना आत्मविश्वास खो चुके है। उन्हें अपने जीते की उम्मीद पहले से ही नहीं थी। गरीबों को 72,000 रुपये देने का वादा भी लोगों को पसंद नहीं आया।

कांग्रेस की अधिकतर घोषणाएं लोगों ने सिरे से ही नाकर दी थी।

राहुल गाँधी ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को जिस जीत का सपना दिखाया था, वो चुनावों के नतीजे आते ही बिखर गया।
मोदी लहर के आगे कांग्रेस के दिग्गज भी नहीं टिक पाए।

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व्यक्तित्व प्रतियोगिता

चुनाव, विचारो, बदलती अर्थव्यस्था और समस्या का कम और व्यक्तित्व का अधिक था। राहुल गाँधी की जीत के रास्ते में मोदी ब्रांड सबसे बड़ी रुकावट थी।

भले ही मोदी पिछले चुनाव में किये गए वायदों को पूरा करने में असफल रहे हो परन्तु फिर भी वो अभी लोगों को अपनी सरकार की सोच और योजनाओ को समझा पाने में सक्षम रहे।

राहुल गाँधी के पास इक्का-दुक्का चुनी हुयी नयी योजनाओ को छोड़ कर बस मोदी सरकार की नाकामयाबी को ही गिनवाया शायद यही कारन रहा की वो लोगों मध्य बड़े नेता के तौर पर स्थापित नहीं हो सके। श्री गाँधी की बड़ी नाकामयाबी का कई कारण रहे उनमे से उनका एक बड़बोला नेता होना भी सामने आया, सोशल मीडिया पर वो एक अस्पष्टवादी नेता साबित हुए है। उनकी कही गयी कई बाटे उन पर ही पलट वार करती है।

कांग्रेस की विचारधारा

ये बात किसी से छुपी नहीं है की गाँधी वंश का उत्तराधिकारी राहुल गाँधी के स्थान पर प्रियनक गाँधी को होना चाहिए। ऐसा मानने के पीछे लोगों के पास कई कारण है।

प्रियंका गाँधी को नए समय की इंदिरा गाँधी के रूप में देखा जा रहा है। माना जाता है की प्रियंका और राहुल काफी करीब है तो अगर प्रियंका, राहुल के स्थान लेती भी है तो इससे उन्हें को समस्या नहीं होगी।

कुछ दिनों के ही प्रचार से प्रियंका गाँधी ने ये साबित कर दिया की वो देश की राजनीती की हवा बदलने में सक्षम है

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निष्कर्ष

कहने और देखने के लिए बहुत कुछ है परन्तु यदि कांग्रेस को ध्यान से देखा जाये तो एक समय में इस देश की सबसे बड़ी पार्टी आज गिरती हुयी दिखाई देती है। कांग्रेस के सामने इसके पार्टी अध्यक्ष के समस्या के साथ साथ और भी कई समस्यें है जिनको सुलझाए बिना आज की राजनीती में जगह बना पाना मुश्किल है।

भाजपा के कई वर्षों के प्रयास के कारण ही आज वो देश पर इतनी बड़ी जीत के साथ आयी है।

आने वाला समय साबित करेगा की कांग्रेस भारत की राजनीती को मजबूत करना चाहती है या सिर्फ अपने लिए और कई बार को झेलने को तैयार है।


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